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अपने भीतर जीवन को सुरक्षित रखने की प्रवृत्ति को बदलना ही जीवन मंत्र है- हितेश शर्मा

राजकीय अधिवक्ता हितेष शर्मा ने किया नवाचार, यु ट्यूब चेनल से लोगों को सीखा रहे है जीवन जीने के मंत्र

अपने भीतर जीवन को सुरक्षित रखने की प्रवृत्ति को बदलना ही जीवन मंत्र है- हितेश शर्मा

शाहपुरा-मूलचन्द पेसवानी

धर्म और अध्यात्म आपको बचाने के लिए नहीं हैं, यह तो खुद को तपाने के लिए, तैयार करने के लिए है, वह भी पूरी जागरूकता के साथ। कोई और मुझे नहीं तपा रहा है, खुद मैं अपने आपको तपा रहा हूं। ऐसा होने पर ही हम स्वयं को अंदर से जान सकेगें तथा कोरोना जैसी महामारी के विषम परिस्थिति के दौर में भी स्वयं को सकुशल रख सकते है। जरूरी नहीं है कि चिकित्सा या पुलिस विभाग का ही कोई कारिंदा कोराना वारियर्स बन कर कार्य करें, हम स्वयं भी यह कार्य बखूबी कर सकते है। घर में रहकर समय व्यतीत करें तथा जरूरतमंदों की सेवा कार्य प्राथमिकता से किया जा सकता है। जरूरतमंद को केवल खाना खिलाना ही सबकुछ नहीं होता है, उसकी केसी भी सेवा की जा सकती है।
यह कहना है कि शाहपुरा के अपर लोक अभियोजक व राजकीय अधिवक्ता एडवाकेट हितेश शर्मा का। एडवोकेट हितेश शर्मा ने वर्तमान में कोरोना संक्रमण के दौर में अपने ही घर रहकर शहर ही नहीं देश दुनियां के लोगों को जागरूक कर स्वयं को जानकर जीवन का मंत्र आत्मसात करने का निर्णय लिया है। इसके लिए बाकायदा उन्होंने अपने घर पर सोशल मीडिया सेंटर तैयार कर अपनी बात को यु ट्यूब चेनल के माध्यम से मुखातिब हो रहे है। कभी कभी तो दिन में एक बार कभी दो या तीन बार भी चेनल पर आकर अपनी बात को इतने सलीके से रख रहे है कि इस माहौल में काफी तादाद में लोग उनके चेनल से जुड़ चुके है। उनका यु ट्यूब चेनल इन दिनों खुब ट्रोल हो रहा है। वो अब तक 95 विडियो इसी प्रकार के तैयार कर अपलोड़ कर चुके है।
अपर लोक अभियोजक एडवोकेट हितेश शर्मा ने बताया कि जो लोग डर की वजह से अपने ईश्वर से प्रार्थना करते हैं, वे प्रार्थना के बारे में कुछ भी नहीं जानते। प्रार्थना तो तभी होती है जब आप पागलपन की हद तक किसी चीज के प्यार में होते हैं। ऐसा होने पर ही परिणाम आते है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जीवन की सच्चाई यह है कि आप हमेशा कुछ चाहते हैं। आप शिक्षित होना चाहते हैं, आप प्यार चाहते हैं, आप जीवित रहना चाहते हैं, आप बच्चों व परिजनों से प्यार चाहते है, आप शहर में अपनी प्रतिष्ठा चाहते है, और भी न जाने क्या-क्या चाहते हैं। क्यों? क्योंकि इन सब चीजों के दम पर ही आपको यह लगता है कि आप कुछ हैं। इसके लिए हमें अपने शरीर पर भी ध्यान देना होगा। शरीर को स्वाध्याय में लगाना होगा। सनातन संस्कृति व वेद पुराणों में दिये गये मार्गदर्शनों पर चलना होगा। स्वयं में सकारात्मकता का भाव जागृत करना होगा। हम स्वयं दूसरों की भलाई कितनी कर रहे है ओर इसे कितना बढ़ा सकते है।
अपर लोक अभियोजक एडवाकेट हितेश शर्मा अपने यु ट्यूब चेनल के संदेशों में बताते है कि अगर कोई स्थिर हो जाए, अकर्मण्यता की स्थिति में आ जाए तो भी उसे परिवर्तित किया जा सकता है। इसके लिए या तो तीव्र क्रियाशीलता हो या फिर निष्क्रियता। या तो जबर्दस्त जुनून हो या बिल्कुल उदासीन। दोनों ही तरीके आपको उस ओर ले जाएंगे, लेकिन समस्या यह है कि लोग कोई भी काम पूरी तरह से नहीं करते, क्योंकि उन्हें डर लगा रहता है कि पता नहीं क्या हो जाए। वे अपने काम में पूरे जुनून के साथ शामिल नहीं होते, ढीले पड़ जाते हैं। न तो वे पूरी तरह जुनूनी ही हो पाते हैं और न ही पूरी तरह उदासीन। हर स्थिति में वे खुद को रोकने लगते हैं। रोकने की यही आदत हर चीज को भविष्य में ले जाकर खड़ा कर देती है। ज्ञान प्राप्ति भी इसीलिए भविष्य में है, क्योंकि चीजों को रोकने की हमारी आदत हो गई है।
अपर लोक अभियोजक एडवाकेट हितेश शर्मा ने कहा कि हमारे भीतर जीवन को सुरक्षित रखने की जो सहज प्रवृत्ति होती है, उसकी वजह से ही यह रोकने की आदत है। जीवित रहने की यह प्रवृत्ति हमारे भीतर बड़े गहरे बैठी हुई है। हम जहां भी जाते हैं, यही सोचते हैं कि खुद को कैसे बचाकर रखा जाए। यहां तक कि धर्म और अध्यात्म को भी खुद को बचाए रखने का साधन बना दिया गया है। धर्म और अध्यात्म आपको बचाने के लिए नहीं हैं, यह तो खुद को तपाने के लिए, तैयार करने के लिए है, वह भी पूरी जागरूकता के साथ। कोई और मुझे नहीं तपा रहा है, खुद मैं अपने आपको तपा रहा हूं। अब अगर आप खुद को बचाने की कोशिश में लगे हैं, या इस उम्मीद में हैं कि ईश्वर आपको बचा लेगा, तो आप बस खुद को बचाए रखने की प्रवृत्ति को और मजबूत बना रहे हैं।
अपर लोक अभियोजक एडवाकेट हितेश शर्मा कहते है कि लोग हमेशा यह ढूंढते हैं कि उनके लिए सही काम क्या है? कोई सही काम नहीं है। अभी हम जो भी कर रहे हैं, उसे करने का सही तरीका क्या है – अगर हम यह जान लें, तो मन सुलझ जाता है। हमने जिस काम को भी करने के लिए चुना है, बस उसे करते जाएं, न इधर देखें, न उधर देखें, बस उस काम को करें। इससे हमें मन और समय से परे जाने का रास्ता मिलता है। समय के मुखौटे ने लोगों को फंसा लिया है, क्योंकि वे बिना इच्छा के अपने जीवन को आगे बढ़ाना ही नहीं चाहते। इच्छा समय पैदा करती है। अगर आप बिना किसी इच्छा के, बिना किसी विचार के यहां बैठ सकें तो आपके लिए समय जैसी कोई चीज नहीं होगी। आपके लिए समय का अस्तित्व ही नहीं होगा। तो कह सकते हैं कि समय इच्छाओं का बाईप्रोडक्ट है। चूंकि आपकी इच्छाएं हैं, इसलिए भविष्य है। भविष्य है तो भूत भी है, और चूंकि भूत है इसलिए आप वर्तमान को खो देते हैं। ऐसे में आपको या तो पूरी तरह स्थिर और शांत होकर बैठना सीखना चाहिए या फिर बेहद क्रियाशील होना चाहिए। आप दोनों भी करने की कोशिश कर सकते हैं। कभी बेहद क्रियाशील और कभी बिल्कुल शांत और स्थिर। इसी तरीके से यह मार्ग भी बनाया गया है कि आप चाहे इस तरह से करें या उस तरह से, दोनों तरीकों से आप एक ही लक्ष्य तक पहुंचेंगे।

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