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आरटीआई के प्रचार-प्रसार में जिला प्रशासन का खर्चा शून्य

आरटीआई के प्रचार-प्रसार में जिला प्रशासन का खर्चा शून्य, 

9 साल से एक धेला भी नहीं किया खर्च

आरटीआई से मिली जानकारी में हुआ खुलासा 

सूचना का अधिकार अधिनियम लागू हुए 14 वर्ष हो चुके हैं, किन्तु सवाई माधोपुर जिला प्रशासन के द्वारा इस अधिनियम के प्रति जनता को जागरूक करने अथवा अधिनियम के प्रचार-प्रसार के लिए एक रुपया तक खर्च नहीं किया है। यह बात सामने आई है एक आरटीआई के जरिए प्राप्त हुए जवाब में। आरटीआई एक्टिविस्ट बेअंत सिंह ने कलेक्टर कार्यालय से जनता के लिये सर्वाधिक उपयोगी आरटीआई अधिनियम के प्रचार-प्रसार में हुए खर्चों का ब्यौरा मांगा था। जिला प्रशासन ने जवाब में बताया है कि वर्ष 2011 से वर्ष 2019 तक आरटीआई के प्रचार-प्रसार के लिए किसी भी तरह का बजट प्राप्त नहीं हुआ है। सूचना का अधिकार अधिनियम की जागरूकता में जिला प्रशासन जीरो साबित हुआ है I 

संसद द्वारा पारित सूचना का अधिकार अधिनियम जो कि जनता के लिए अतिमहत्त्वपूर्ण कानून है, उसके बारे में जनता के बीच प्रचार-प्रसार ही नहीं किया जा रहा है। राजस्थान तो पहला राज्य है जहाँ सूचना का अधिकार अधिनियम सबसे पहले लागू हुआ है। बेअन्त ने बताया कि सूचना का अधिकार सप्ताह प्रत्येक वर्ष 5 अक्टूबर से 12 अक्टूबर को मनाया जाता है जिसके लिए तीन लाख रुपए विभिन्न गतिविधियों के लिए दिए जाते हैं, जैसे कि आरटीआई वर्कशॉप लगवाने के लिए, सेमिनार आयोजित करवाने के लिए, प्रेस-मीट व कॉलेज में आरटीआई से संबंधित प्रतियोगिता के लिए I इसके साथ ही प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी आरटीआई के प्रचार के लिए फंड दिया जाता है और इतना ही नहीं, बल्कि हार्डिंग लगवाने, अधिनियम की जानकरी से सम्बन्धित पंपलेट छपवाकर लोगों के बीच बाँटने के के लिए, बुकलेट प्रकाशित करने के लिए यह फण्ड राज्य व जिला प्रशासन को दिया जाता है I 

इसके साथ ही, सूचना अधिकार से संबंधित नवाचार के माध्यम से जागरूकता फैलाने के लिए चार लाख रुपए प्रतिवर्ष दिए जाते हैं I जागरूकता गतिविधियां जैसे कि नुक्कड़ नाटक, स्थानीय भाषा में गीत, डिस्टेंस लर्निंग प्रोग्राम, ऑनलाइन सर्टिफिकेट कोर्स आदि I वहीँ राज्य और केंद्र के लोक सूचना प्राधिकरणों, मीडिया पर्सन और सिविल सोसायटी ऑर्गेनाइजेशंस से संबंधित लोगों के आरटीआई वर्कशॉप और सेमिनार के लिए प्रति सेमिनार और वर्कशॉप एक लाख रुपए की राशि बजट फंड के रूप में दी जाती है I राज्य और जिला स्तर पर गाइड बुक का प्रकाशन करना होता है I साथ ही हेल्पलाइन की भी व्यवस्था करनी होती है I 

एक्टिविस्ट बेअन्त ने बताया कि कानून के प्रति लोगों को जागरूक न करना सरकारी अधिकारी और कर्मचारियों द्वारा सिविल सेवा नियमों का उल्लंघन भी है I उन्होंने कहा है कि वे इसके लिए डी ओ पी टी और सूचना आयोग को पत्र लिखेंगे और साथ ही प्रधानमन्त्री कार्यालय की मॉनिटरिंग सेल को भी सूचित करेंगे कि किस तरह से चौदह वर्षों से लोक सेवक आरटीआई कानून का प्रचार-प्रसार जिले में नहीं कर पाए हैं I

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