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खनन माफियाओं की धमक से लोकतंत्र की चमक फीकी-प्रयागराज

मौत के शिकार हो रहे प्रयागराज जनपद के विकासखंड शंकरगढ़ के पत्थर खदान मजदूर भूख से जब अतरिया पेट में दर्द देती हैं जब री री याति नई पीढ़ी मौत की चादर ओढ़ लेती है तब तनी हुई मुट्ठी हाथ में बंदूक थाम लेती है तब जंगलों की बीहड़ में बगावत की जंग शुरू होती है तब सी शक्ति है ममता कलंकित होती है मानवता स्तब्ध कर देने वाली शांति चीत्कार की ध्वनि सन्नाटा तोड़ती है खनन माफियाओं की धमक से लोकतंत्र की चमक फीकी अवैध खनन रोकने के लिए कार्यवाही तेज करने के निर्देश उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य में खनन की अवैध गतिविधियों को रोकने के लिए जिला अधिकारियों और मंडल आयुक्तों को दिशा निर्देश जारी किए हैं लेकिन राज्य भर में फैला अवैध खनन का गोरखधंधा रुकने का नाम नहीं ले रहा है इलाहाबाद के नैनी औद्योगिक क्षेत्र शंकरगढ़ भी सिलिका सैंड और बालू उद्योग के शिकार होते रहे हैं इस जिले में भी जिसने भी खनन मामले में कोई कार्यवाही करने की कोशिश की तो उसका पर कतर दिया जाता है सन 2013 जून के महीने में एसडीएम 12 श्री राममूर्ति मिश्रा ने पूर्व में 81000 घन मीटर चिल्का सेंड बरामद की तो उन्हें अवकाश पर जाना पड़ा था तेजतर्रार आईएएस अधिकारी वह कमिश्नर हिमांशु कुमार को भी 24 घंटे के अंदर तबादला आदेश पकड़ा दिया गया था हाईकोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप भी किया था परंतु वही हुआ जो खनन माफियाओं की मंशा थी इसके बाद आईएएस जितेंद्र कुमार ने भी खाना न मामले में कार्यवाही शुरू करनी चाहिए तो उनका भी तबादला करवा दिया गया था उनके स्थान पर कुमार कमलेश ने मंडलायुक्त पद पर कार्यभार संभाला था इसी बीच सिलिका सैंड मामले में वर्तमान मुख्य विकास अधिकारी श्री अटल राय के नेतृत्व में एक टीम गठित की गई थी जिसने भी उस समय के जिलाधिकारी श्री राजशेखर को जांच रिपोर्ट सौंपी थी उन्होंने स्वयं मौके का निरीक्षण भी किया था शंकरगढ़ क आसपास शिवराजपुर गढ़वा किला आदि गांव में सिलिका सैंड मामले में गिरफ्तारियां भी हो चुकी है भारत में हर पंचायत से लेकर विधानसभा और संसद सदस्यों तक हर चुनाव गरीबों और गरीबी के नाम पर और मुद्दे पर लड़ा जाता है चुनाव से जीतकर लोग हमारे प्रतिनिधि बन कर संवैधानिक सदनों में जाते हैं ताकि वे अपने वायदों पर अमल कर सके पर क्या आपको पता है कि गरीबी की परिभाषा क्या होती है उत्तर प्रदेश में खनन नीति का ऐलान ना होने और कारगर कार्रवाई के अभाव में रोजाना करीब लाखो रुपयों का खनन अवैध खनन होता है खनन में मोटी कमाई देख शराब कारोबारी पोंटी चड्ढा तक इसमें हाथ आजमाने से नहीं बाज आऎ थे प्रदेश के सबसे बड़े खनन कारोबारी चिकारा के साथ इस धंधे में उतरे पोंटी ने मायावती सरकार के आखिरी 2 सालों में तो पूरे कारोबार को अपने आगोश में ले लिया था लेकिन आज तक किसी की नजर इन कठोर श्रृंखलाओं को चीरने वालों की ओर नहीं गई है जिनकी कड़ी मेहनत पर टिका हुआ है सारा व्यापार आज हालात इस कदर बद से बदतर हो गए हैं की गरीब मजदूर दो वक्त की रोटी के लिए ललक रहे हैं मजे की बात तो यह है कि पत्थर खदानों में काम करने वाले आदिवासी मजदूरों को सील कोशिश नामक जानलेवा बीमारी का शिकार होकर मौत के कगार पर खड़े हैं तीन आदिवासी मजदूरों को पत्थर काटने में उड़ने वाली सिल्का नामक धूल को सास द्वारा फेफड़ों में जाने से तथा फेफड़ों में जमने वाली सील का धूल की परत से इनके शरीर से सील कोशिश नामक रोग पल रहा है और आज से भोले भाले अनपढ़ गरीब मजदूर नारकीय यातना को भोगने के लिए मजबूर है इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं जबकि इस बीमारी का इलाज अभी संभव नहीं हो पाया है सरकार द्वारा इस उद्योग से भारी राजस्व की प्राप्ति की जाती है लेकिन आज तक इस रोग के कारण पर कोई कारगर कदम नहीं उठाया गया है जब वर्ष 1984 में विभिन्न क्षेत्रों में 150 से अधिक मजदूरों की मृत्यु हुई थी जिसमें आदिवासियों की संख्या सर्वाधिक थी तत्कालीन सांसद ने राज्यसभा में सरकार का ध्यान इस ओर आकृष्ट जरूर करवाया था तो सरकार ने इसे हल्के में ले लिया आज यही वजह है कि अभी तक इन बेबस मजदूरों की सुरक्षा के लिए कोई ठोस उपाय नहीं किया गया है सिलिकोसिस रोग बुंदेलखंड क्षेत्र के उत्तर प्रदेश भूभाग में आने वाले जनपदों में प्रयागराज जनपद के शंकरगढ़ चित्रकूट के भरतकूप महोबा के कबरई कुलपहाड़ हमीरपुर के महुआ सुमेरपुर झांसी के पहाड़ गांव एवं सैकड़ों आसपास के इलाकों के पत्थर खदानों में काम करने वाले मजदूरों के शरीर में पनप रहा है सिलिकोसिस रोग यह मजदूर यहां के लगभग 500 खदानों में काम कर रहे हैं पत्थर खनन में आधुनिक मशीनों के चलने से परेशानियां और बढ़ा दी है पहले छेनी हथौड़ी से पत्थर चिलने काटने में धूल कम उड़ती थी अब कटर का इस्तेमाल जानलेवा साबित हो रहा है जब हमारी टीम ने उक्त खदानों में जाकर इन मजदूरों के साथ एक व्यापक सर्वेक्षण किया तो पाया कि मजदूरों को इस जानलेवा बीमारी का पता नहीं है इस बीमारी को यह भोले भाले मजदूर देवी इच्छा मानते हैं लेकि उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने प्रदूषण फैलाने वाले कबरई झांसी भरतकूप तथा शंकरगढ़ के केसरो को सुविधा शुल्क लेकर मनमानी करने की छूट दे रखी है जबकि नियम है कि पर्यावरण अधिनियम के तहत प्रत्येक स्टोन क्रेशर पर निम्न व्यवस्थाएं आवश्यक है हवा की दिशाओं को दृष्टिगत रखने के लिए हेलमेट गल बस जूते तक 1 मजदूरों को हासिल नहीं है पत्थरों से छोटे-छोटे टुकड़े करने वाली क्रेशर मशीन से उड़ने वाली धूल से मरीजों को टीवी की जानलेवा बीमारी हो जाती है जिस भी मजदूर ने पत्थर खदान में तीन-चार साल तक काम किया उसको टीवी का शिकार होना निश्चित है और मजदूरों के टीवी का शिकार होते ही शुरू होती है मालिकों की क्रूरता और मजदूरों के दुर्भाग्य की कहानी मालिक उस मजदूर को नौकरी से निकाल देता है जिसकी मेडिकल रिपोर्ट में टीवी की पुष्टि हो चुकी है ताकि कहीं इस मजदूर को इलाज ना कराना पड़ जाए और यदि मजदूर मर जाए तो उसे मुआवजा भी ना देना पड़े मालिक मजदूरों का नाम रजिस्टर में नहीं चाहते और मजदूरों का इलाज कराने से मुआवजा देने से साफ मुकर जाते हैं श्रम कानूनों का खुलेआम उल्लंघन करते खदान मालिक सत्ता के साथ अपने समीकरण बैठाकर मजदूरों का शोषण करने के नए नए फार्मूले अपनाते रहते हैं खनिज संपदा के मामले में खनिज माफियाओं और सरकारी तंत्र ने गरीब और मध्यम वर्ग का जीना मुहाल कर दिया है जिसके कारण लाल सेना और माओवादियों का खतरा मंडराने लगा है शंकरगढ़ और चित्रकूट भरतकूप में दस्तक दे चुके माओवादी बना अधिकारों से वंचित आदिवासियों को संगठित करने में लगे है ।

G NEWS PORTAL से आरडी द्विवेदी की खास रिपोर्ट

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