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पायलेट सहित 19 विधायक इस्तीफा दे सकते कांग्रेस सरकार से

ब्रेकिंग न्यूज- पायलेट सहित 19 विधायक इस्तीफा दे सकते कांग्रेस सरकार से 

 

सवाल – यदि अशोक गहलोत की सरकार नहीं गिरी तो सचिन पायलट का राजनीतिक भविष्य क्या होगा?

बसपा के विधायकों के हटने के बाद भी फ्लोर पर बहुमत गहलोत के साथ नजर आ रहा है। यह बात अलग है कि फिर भी गहलोत को अल्पमत की सरकार चलानी पड़ेगी,

सवाल – 14 अगस्त से पहले पायलट गुट के 19 विधायक इस्तीफा दे सकते हैं,

जयपुर- राजस्थान में हाईकोर्ट ने यदि बसपा के 6 विधायकों पर वोट डालने पर रोक लगा भी दी तो भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ विधायकों का बहुमत नजर आ रहा है। इसलिए सवाल उठा है कि यदि सरकार नहीं गिरी तो कांग्रेस के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष और डिप्टी सीएम सचिन पायलट का राजनीतिक भविष्य क्या होगा? मौजूदा समय में कांग्रेस के 107 विधायक है, इनमें से यदि पायलट गुट के 19 और बसपा से आए 6 विधायकों को हटा भी दिया जाए तो कांग्रेस विधायकों की संख्या 82 होती है। सब जानते हैं कि मुख्यमंत्री गहलोत के साथ जैसलमेर के सूर्यागढ़ होटल में 10 निर्दलीय, 2 बीटीपी तथा एक-एक विधायक माकपा और आरएलडी का बैठा हुआ है। इन 14 विधायकों के वोट मिलने से विधानसभा में फ्लोर पर सरकार के साथ 96 विधायकों का समर्थन होगा। आंकड़ों के इस खेल में यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि सचिन पायलट गुट के 19 कांग्रेसी विधायक किसी भी स्थिति में अपना वोट कांग्रेस के खिलाफ नहीं दे सकते हैं। यदि बहुमत परीक्षण के समय पायलट गुट के 19 विधायक विधानसभा में उपस्थित रहते हैं तो उन्हें कांग्रेस के पक्ष में ही वोट देना होगा। यदि विधानसभा में पार्टी व्हिप का उल्लंघन करते हैं तो विधायकी तो जाएगी ही साथ ही भविष्य में चुनाव भी नहीं लड़ सकेंगे। ऐसे में पायलट गुट के 19 विधायक 14 अगस्त से पहले पहले इस्तीफ़ा दे सकते हैं। ताकि अशोक गहलोत की सरकार अल्पमत में आ जाए। इस्तीफ़ा देने से ऐसे विधायक विधानसभा का उपचुनाव लड़ सकते हैं। यानि इस्तीफ़ा देने पर ये विधायक चुनाव लडऩे के अयोग्य घोषित नहीं होंगे। यदि गहलोत सरकार 14 अगस्त को बहुमत परीक्षण का प्रस्ताव रखती है तो उसके पास 96 विधायक होंगे, जबकि विरोध में भाजपा के 72, 3 निर्दलीय तथा तीन आरएलपी के विधायक होंगे। ऐसे में सरकार के विरोध में 78 वोट ही पड़ेंगे। इन स्थितियों में दो सदस्यीय विधानसभा में गहलोत सरकार अपना बहुमत साबित कर देगी, लेकिन फिर सीएम गहलोत को अल्पमत की सरकार चलानी पड़ेगी। पूर्व में सौ विधायक होने की वजह से ही गहलोत ने बसपा के सभी 6 विधायकों को कांग्रेस में शामिल करवाया था। गहलोत जानते हैं कि किन परिस्थितियों में बसपा विधायकों को शामिल करवाया गया। अब गहलोत को बहुमत से 18 विधायकों की कमी के साथ सरकार चलानी पड़ेगी। ऐसे में साकार कितने दिन चलेगी, यह आने वाले दिनों में ही पता चलेगा। गहलोत के पास अभी जो 100 विधायक हैं उन्हें ही बड़ी मुश्किल से संभाल कर रखा हुआ है। 10 जुलाई से 31 जुलाई तक इन विधायकों को जयपुर की होटल फेयरमोंट में रखा गया और अब ये विधायक जैसलमेर के सूर्यागढ़ होटल में रह रहे हैं। सूत्रों की माने तो गहलोत के भरोसे के अधिकारी सभी विधायकों पर कड़ी नजर रखे हुए हैं। कोई विधायक सचिन पायलट से सम्पर्क नहीं कर सके, इसके लिए विधायकों के मोबाइल फोनों पर भी नजर रखी जा रही है। यानि किसी भी विधायक पर अशोक गहलोत को भरोसा नहीं है। गहलोत 14 अगस्त को भले ही बहुमत साबित कर दें, लेकिन आगे सरकार चलाना मुश्किल होगा। उधर इस्तीफ़े के बाद सचिन पायलट प्रदेश में तीसरा मोर्चा बना सकते हैं। पायलट के मोर्चे को भाजपा का भी समर्थन मिलेगा। हो सकता है कि उपचुनावों में पायलट के मोर्चे के उम्मीदवारों के सामने भाजपा अपना उम्मीदवार खड़ा नहीं करे। ताकि इस्तीफ़ा देने वाले सभी 19 विधायक वापस चुनाव जीत सके। पायलट भी मानते हैं कि अब कांग्रेस में पहले जैसा सम्मान नहीं होगा। ऐसे में पायलट की रणनीति कांग्रेस के विरोध में ही होगी। इसमें कोई दो राय नहीं कि पायलट का जातीय आधार है। गहलोत माने या नहीं लेकिन सात वर्ष पहले पायलट ने जब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष का पद संभाला था, तब कांग्रेस के मात्र 21 विधायक थे। 

दिसम्बर 2018 में हुए विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस 99 विधायक चुने गए। पायलट के जातीय आधार का इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि भाजपा का एक भी गुर्जर उम्मीदवार चुनाव नहीं जीता। सचिन पायलट के ही मुख्यमंत्री बनने की उम्मीद में गुर्जर मतदाताओं ने एक मुश्त कांग्रेस को वोट दिए। चुनाव में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे विरोधी हवा ने भी कांग्रेस को बहुमत दिलाने में मदद की।

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