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श्रीमदभागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ महोत्सव में कलश यात्रा – सवाई माधोपुर

श्री वीर भोजा बाबा के विशाल वार्षिक मेले के शुभअवसर पर श्रीमदभागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ महोत्सव में कलश यात्रा,गणेश पूजन, के साथ कथा एवं मेले का प्रारंभ

कुनकटा कलां गांव में श्री वीर भोजा बाबा के विशाल वार्षिक मेले के उपलक्ष में बैंड बाजों के साथ में कलश यात्रा निकाली गई

आयोजन से जुड़े मनोज कुनकटा ने बताया कि गांव के सीताराम जी मंदिर पर प्रातः 11:00 बजे विधिवत पूजा अर्चना की गई इसके बाद बैंड बाजों के साथ कलश यात्रा शुरू हुई जिसमें 1100 महिलाएं सिर पर कलश धारण कर मंगल गीत गाते हुए चल रही थी

कुछ महिलाएं बाबा के भजनों पर डीजे के आगे नृत्य करती हुई चल रहींथीं,वही उत्साही युवक श्री वीर भोजा बाबा के जयकारों लगाते हुए दुसरे डीजे पर नाचते हुए चल रहे थें कलश यात्रा का जगह-जगह पुष्प वर्षा कर स्वागत किया गया कलश यात्रा के कथा स्थल श्री वीर भोजा बाबा मंदिर पहुंचने पर विधिवत पूजा अर्चना की गई।

 श्रीमद्भागवत की कथा कथावाचक श्रेदय श्री छैल विहारी जी शास्त्री जी ने पहले दिन कथा के महात्यम के बारे में 

 सबसे पहले श्रीमद्भागवत की साधना पद्धति समझाई ।

  कहा कि धर्म का प्रयोजन, मोक्ष के लिए है । धर्म, धन के लिए नहीं है ।और धन, धर्म के लिए है “ भोग” के लिए नहीं है ।और “भोग” जीवन के लिए है न कि “ इन्द्रियों “ के तृप्ति के लिए । और “जीवन “ ईश्वर की जिज्ञासा के लिए है । 

छेलविहारी जी ने कहा ईश्वर को जानना ही तत्व को जानना है और जब तक श्रृष्टि रहेगी ऐसे तत्व ज्ञानी ईश्वर के ज्ञान का उपदेश करते रहेंगे । और यह सत्य क्या है ? यह सत्य ऐसा है जिसमें ज्ञाता और ज्ञेय के भेद से रहित आपकी ज्ञान स्वरूप आत्मा ।

योगी लोग उसी सत्य को परमात्मा कहते हैं ,वेदान्ती लोग ब्रह्म , भक्त लोग भगवान कहते हैं । यह तीनों वस्तु एक ही है आप जो चाहे नाम दे दें ।

भागवत साधना की प्रकिया इस प्रकार है । वैसे तो भागवत किसी समय और कहीं भी पढ़ी या सुनी जा सकती है , फिर भी यदि संभव है तो मनुष्य तीर्थ यात्रा करें । जो भी वस्तु, हृदय को पवित्र करती है उसे पुण्य कहते है ।और जिस स्थान पर जाने से मनुष्य तर जाए उसे तीर्थ कहते हैं । और तीर्थ यात्रा को पहली भूमिका बताया ।

दूसरी भूमिका में मनुष्य को तीर्थ स्थानो में संतों की संगत करे और संभव हो तो उनकी सेवा करे ।

तीसरी भूमिका यह है कि मनुष्य उन संतों से कथा सुने , भागवत सुने और उनके वचन सुने ।

चौथी भूमिका के अनुसार मनुष्य को भागवत में श्रृद्धा हो जाय । श्रृद्धा का अर्थ होता है सत्य पर होने धारणा ।

पाँचवी भूमिका के अनुसार मनुष्य को भागवत में विश्वास हो जाय , विश्वास का अर्थ होता है, विगत स्वाँस हो जाना ।

छठवीं भूमिका में भागवत सुनते सुनते , वासुदेव , हृदय में विराजमान हो जाते है और हृदय के सभी दोषों से मुक्त कर देते हैं ।

सातवी भूमिका में हृदय के पवित्र हो जाने पर मनुष्य काम क्रोध से मुक्त हो जाता है और उसमें से रजो और तमों गुण भी निष्क्रिय हो जाते हैं ।

आठवीं भूमिका में मन प्रसन्न हो जाता है और चित्त की आसक्ति कहीं पर भी नही रहती है ।

नवीं भूमिका में मनुष्य के अंदर भगवत भक्ति अपना पाँव जमा लेती है । और उसके दसवीं भूमिका में तत्व ज्ञान हो जाता है । तत्व ज्ञान का अर्थ , अंत:करण में पड़ी सभी गाँठे खुल जाती हैं । और इसी जीवन में मुक्ति मिल जाती है ।

श्रीमद्भागवत के द्वारा इसी जीवन में मुक्ति अधिष्ठ है ।

“स्वातंत्र्यम् परमं पदम “

ध्यान रखिए सद्य फल की बात करी है । इसी जीवन में यहीं पर मिलने वाला फल ।

आयोजन से जुड़े मनोज कुनकटा ने बताया कि इसी के साथ बांसरोटा परिवार के गांव कुनकटा,मच्छीपुरा,बाढ़, किशन कि झोपड़ी,कोठी काडी दड़ी, बाढ़ नेहड़ी,मोतीपुरा सहित 46 गांव बांसरोटा परिवार की ओर से हर वर्ष की तरह शनिवार से श्री वीर भोजा बाबा का विशाल वार्षिक मेला शुरू हो गया।

भागवत कथा प्रतिदिन सुबह11 से 5 बजे तक चलेंगी। 26 जनवरी को मेले के समापन पर विशाल भंडारा किया जाएगा।

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